शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009

ख़ुशी

सुबह सवेरे पूरब से सूरज जब भी मुस्काता है
अपनी किरणों से जग को वह ख़ुशी दे जाता है

आसमान में देखो पक्षी कैसे उड़ाते जाते है ?
करते है कलरव और गीत ख़ुशी के गाते है

कलकल के के बहती नदी सबको ये समझाती है
रुकने को दुःख कहते है चलना ख़ुशी कहलाती है

फूलों पे मढ़राते भवंरे जब उसका रस पा जाते है
हो कर के मतवाले वे भी ख़ुशी में गाते है

काले काले बदल धरती पे जब बुँदे बरसते है
खेतो में लहराते पौधे झूम ख़ुशी में जाते है

3 टिप्‍पणियां:

मनोज कुमार ने कहा…

आपका सृजनात्मक कौशल हर पंक्ति में झांकता दिखाई देता है।

सिधे रस्ते की टेढ़ी चाल ने कहा…

शुक्रिया !!
बस आप लोगो की समीक्षात्मक टिप्पड़ी का स्वागत रहेगा.

shikha ने कहा…

very nice